सखी सहेली मंदिर में धूमधाम से मनाया गया होली महोत्सव

सीताराम बाजार के क्षेत्रीय लोगों एवं मंदिर के प्रबंधक अजित सिंह भूषण द्वारा आयोजित होली महोत्सव में भजन व संगीत कार्यक्रम किया। कार्यक्रम में क्षेत्रीय व्यापारियों और अतिथियों ने जमकर फूलों की होली खेली। 

 
सखी सहेली मंदिर में धूमधाम से मनाया गया होली महोत्सव
New Delhi: पुरानी दिल्ली के सीताराम बाजार स्थित सखी सहेली मंदिर में भव्य होली महोत्सव का आयोजन किया गया। महोत्सव में क्षेत्रीय लोगों ने समा बांध दिया।

सीताराम बाजार के क्षेत्रीय लोगों एवं मंदिर के प्रबंधक भूषण द्वारा आयोजित होली महोत्सव में भजन व संगीत कार्यक्रम किया। कार्यक्रम में क्षेत्रीय व्यापारियों और अतिथियों ने जमकर फूलों की होली खेली। 

मंदिर के प्रबंधक अजित सिंह भूषण ने बताया की होली महोत्सव मंदिर की नई परंपरा के तौर मनाई गई है और यह हर निभाई जाएगी। 

गौरतलब है कि आज रंगभरी एकादशी है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती हैं। हर साल रंगभरी एकादशी फाल्गुन मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आती है। इस एकादशी को अमालकी एकादशी भी कहते हैं। आज के दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ आंवला के पेड़ की भी पूजा होती है। आज के दिन काशी को सजाया जाता है।

मान्यता है कि आज पहली बार भगवान शिव माता पार्वती को काशी लेकर आए थे। इसलिए ये एकादशी बाबा विश्ननाथ के भक्तों के लिए महत्वपूर्ण होती है। आज से काशी में होली का पर्व शुरू हो जाता है जो अगले छह दिनों तक चलता है।

माता पार्वती आती हैं ससुराल

आज के दिन बाबा विश्वनाथ के मंदिर को दूल्हे के रूप में सजाया जाता है। फिर हर्ष और उल्लास के साथ माता पार्वती का गौना कराया जाता है। मान्यता है कि आज ही के दिन भगवान शिव माता पार्वती को काशी लेकर आए थे। इसके बाद शिवभक्तों ने गुलाल और अबीर खेलकर खुशी मनाई थी।

महत्व
रंगभरी एकदाशी को अमालकी एकादशी भी कहते हैं। इस दिन विधि विधान से पूजा करने से भगवान शिव और विष्णु का आशीर्वाद मिलता है। आमलकी एकादशी के दिन आंवला के पेड़ की पूजा करने का विशेष महत्व है।
नगरों में घूमते हैं बाबा विश्वनाथ

रंगभरी एकादशी के दिन काशी विश्वनाथ को अच्छे से तैयार करके घुमाया जाता है। मान्यता है आशीर्वाद देने के लिए बाबा अपने भक्तों और श्रद्धालुओं के बीच जाते हैं। साथ में कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी होता है। और, इसी दिन से काशी में होली की शुरुआत होती है। आपको बता दें काशी में हर साल बाबा विश्वनाथ का भव्य श्रृंगार रंगभरी एकादशी, दीवाली के बाद आने वाली अन्नकूट और महाशिवरात्रि के दौरान किया जाता है।

शोक होता है खत्म

कहा जाता है कि रंगभरी एकादशी से ही घरों में शुभ और मांगलिक कामों की शुरुआत हो जाती है। इसके अलावा जिन लोगों के घरों मृत्यु के कारण त्योहार रुके होते हैं, इस एकादशी से उन घरों में त्योहारों को उठाया जाता है।

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