Bala Movie Review: दर्शकों को भाई आयुष्मान की ‘बाला’, आप भी जानें कैसी है फिल्म

Bala Movie Review
New Delhi: हमारे समाज में लड़कियों का बॉडी शेमिंग का शिकार होना बहुत ही आम बात है। काले रंग या मोटे-पतले होने के कारण उन्हें जिंदगी भर अपमान सहना पड़ता है, मगर यहां निर्देशक अमर कौशिक की ‘बाला’ (Bala Movie Review) लड़कों के गंजेपन की बात करती है।

यह निर्देशक की चतुराई ही है कि वह एक तरफ गंजेपन की समस्या (Bala Movie Review) को डील करते हैं, तो दूसरी तरफ काली लड़की के प्रति समाज के संकीर्ण और हीन रवैये को बताना नहीं भूलते। दिलचस्प बात यह है कि वह समाज में सालों से चली आ रही इस प्रॉब्लम का सल्यूशन देते हुए यह कहना नहीं भूलते कि आप जैसे हो, वैसे खुद को स्वीकार करो। आपको बदलना क्यों है?

बचपन में बालमुकुंद उर्फ बाला (Bala Movie Review) के बाल घने और सिल्की थे और वह उन पर इतराया भी खूब करता था। मगर पच्चीस साल की उम्र तक आते-आते उसका घना और खिला चमन ऐसा उजड़ा कि सर के बाल तेजी से जाने लगे। बढ़ते गंजेपन के कारण बाला की बचपन की गर्लफ्रेंड उसे छोड़ कर चली जाती है। समाज में उसका मजाक बनता है। नौकरी में डिमोशन मिलता है और एग्जिक्यूटिव के पद से फेयरनेस क्रीम बेचने का काम दिया जाता है। उसकी शादी नहीं हो पाती। बालों को सिर का ताज समझनेवाला बाला बालों को उगाने की जो सैकड़ों नुस्खे अपनाता है, वे भले हास्यास्पद या घिनौने हों, मगर बाला को यकीन है कि उसके बालों की बगिया एक दिन जरूर खिलेगी।

हालांकि उसकी बचपन की स्कूल मेट लतिका (भूमि पेडनेकर) उसे बार-बार आईना दिखाने की कोशिश करती है, मगर वह लतिका से चिढ़ता है। पेशे से जानी-मानी दबंग वकील लतिका काले रंग के कारण नकारी जाती रही है, मगर उसने कभी खुद को हीन महसूस नहीं किया। उधर बाल उगाने की हर तरकीब आजमा चुका बाला जब हेयर ट्रांसप्लांट के लिए खुद को तैयार करता है, तो उसे पता चलता है कि डायबिटीज के कारण उसे समस्या हो सकती है। हर तरह से हताश होने के बाद वह अपने पिता (सौरभ शुक्ला) द्वारा लाया हुआ विग पहनता है, तो उसका आत्मविश्वास लौटता है। उसी कॉन्फिडेंस के बल पर वह टिक टॉक स्टार परी (यामी गौतम) से अपने प्यार का इजहार करता है। बात शादी की मंजिल तक पहुंचती है, मगर परी बाला के गंजेपन से अनजान है। क्या होगा जब उसे बाला के गंजेपन की सचाई का पता चलेगा? क्या बाला खुद अपने गंजेपन को स्वीकार कर पाएगा? यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी।

निर्देशक अमर कौशिक की बाला से पहले पिछले हफ्ते गंजेपन के मुद्दे पर ‘उजड़ा चमन’ आई थी, मगर यहां अमर कौशिक की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने इस इस मुद्दे को गहराई से उकेरा है। मुद्दे की तह में जाते हुए उन्होंने इसे मेलोड्रामा की चाशनी में डुबोने के बजाय कॉमिडी के फ्लेवर से सजाया है। कानपुर के बैकड्रॉप में बनी गई कहानी में कानपुरिया एक्सेंट किरदारों को मजेदार बनाता है। फर्स्ट हाफ बहुत मजेदार है, मगर सेकंड हाफ में कहानी में भाषणबाजी झलकने लगती है, मगर क्लाइमैक्स एक खूबसूरत संदेश दे जाती है। काली लड़की के रूप में निर्देशक भूमि पेडनेकर के मेकअप पर थोड़ा-सा ध्यान देते, तो बेहतर था। लेखक नीरेन भट्ट के ‘हेयर लॉस नहीं आइडेंटिटी लॉस हो रहा है हमारा’ जैसे वन लाइनर्स हंसाने में कामयाब रहते हैं। सचिन-जिगर के संगीत में बादशाह, शाल्मली, गुरदीप और सचिन-जिगर का गया ‘डोंट बी शाय’ गाना दर्शनीय बन पड़ा है।

एक बार फिर आयुष्मान खुराना ने शानदार और जानदार अभिनय से साबित कर दिया कि वे हर तरह की भूमिकाएं करने में सक्षम हैं। अभिनेता के रूप में गंजे किरदार को चुनना उनकी इमेज के लिए रिस्की भी हो सकता था, मगर उन्होंने न केवल उसे चुनने का साहस किया बल्कि उस भूमिका में छा गए। यामी गौतम ने स्मॉल टाउन टिक टॉक स्टार की भूमिका और उनकी मानसिकता का सशक्त चित्रण किया है। वे खूबसूरत भी बला की लगी हैं। भूमि की भूमिकाओं की चॉइस की दाद देनी होगी। सांड की आंख की बूढ़ी दादी के बाद काली लड़की लतिका के किरदार को वे बखूबी जी गई हैं। सहयोगी भूमिकाओं में सौरभ शुक्ला, जावेद जाफरी, सीमा पाहवा, दीपिका चिखलिया और अभिषेक बैनर्जी ने जमकर मनोरंजन किया है।