जब दिलीप कुमार की इस बात से खफा हो कई थी लता मंगेशकर, 13 साल तक नहीं की थी बात

मुंबई। लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) और दिवंगत अभिनेता दिलीप कुमार (Dilip Kumar) का रिश्ता भी अपने आप में एक मिसाल है। लता मंगेशकर ने जिंदगी भर दिलीप कुमार को राखी बांधी और दिलीप साहब ने भी अपनी छोटी बहन पर स्नेह ही लुटाया।
 
जब दिलीप कुमार की इस बात से खफा हो कई थी लता मंगेशकर, 13 साल तक नहीं की थी बात

मुंबई। लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) और दिवंगत अभिनेता दिलीप कुमार (Dilip Kumar) का रिश्ता भी अपने आप में एक मिसाल है। लता मंगेशकर ने जिंदगी भर दिलीप कुमार को राखी बांधी और दिलीप साहब ने भी अपनी छोटी बहन पर स्नेह ही लुटाया। लेकिन क्या आप जानते हैं, इसके बावजूद एक बात ऐसी है जिसकी वजह से दोनों ने सालों तक बात नहीं की थी।

दरअसल, मुंबई के मलाड में स्थित बॉम्बे स्टूडियोज में रिकॉर्डिंग के लिए लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) लोकल ट्रेन से ट्रेवल करती थीं। उस वक्त उनके साथ प्रसिद्ध संगीतकार अनिल बिस्वास भी हुआ करते थे। उन दिनों दिलीप कुमार भी अपनी जगह बनाने के लिए जद्दोजहद कर रहे थे। एक दिन वो भी इनके साथ ट्रेन में चढ़े।

अनिल बिस्वास और दिलीप कुमार (Dilip Kumar) एक-दूसरे को जानते थे। बात हुई और अनिल बिस्वास ने लता का परिचय करवाया और कहा, जब तुम इसकी आवाज सुनोगे तो पसंद आएगी। उर्दू के आशिक दिलीप कुमार ने पूछा कि लता किस शहर से है। अनिल बिस्वास ने कहा कि महाराष्ट्र से है। दिलीप कुमार (Dilip Kumar) ने कहा कि महाराष्ट्र के गायकों की आवाज ठीक हो तब भी उनका उर्दू का उच्चारण ठीक नहीं होता। उनकी गायकी दाल चावल जैसी होती है।

दिलीप कुमार की ये बात लता (Lata Mangeshkar) को बिलकुल पसंद नहीं आयी और उन्हें बुरा लगा। लता को परफेक्शन की आदत है तो उर्दू तलफ़्फ़ुज सुधारने की ठान कर वो मिली अनिल बिस्वास के असिस्टेंट मोहम्मद शफी से और उनसे कहा कि उन्हें अपना उर्दू तलफ़्फ़ुज सुधारना है। शफी ने उन्हें मिलवाया एक मौलाना साहब 'मेहबूब' से जिनके साथ लता रोज उर्दू सीखने लगी।

लता की उर्दू सुधरने लगी। इसी दौरान उन्होंने महल का गाना गाया 'आएगा आने वाला' जो बहुत बड़ा हिट हुआ। इस गाने की रिकॉर्डिंग के समय अदाकारा नरगिस भी उसी स्टूडियो में आयी थीं। उनके साथ उनकी मां जद्दनबाई भी थी। जद्दनबाई खुद बहुत अच्छा गाती थीं और संगीत की गहरी समझ रखती थीं। हिंदी फिल्मों की प्रथम महिला संगीतकारों में उनका नाम आता था।

जद्दनबाई ने रिकॉर्डिंग सुनी और लता को बुलाया और कहा कि तुम्हारी आवाज बहुत अच्छी है और जितनी सफाई से तुमने 'बग़ैर' लफ्ज गाया है उस से जाहिर है कि तुम्हारी उर्दू बहुत अच्छी है। ये सुनने के बाद लता को थोड़ा भरोसा हुआ कि अब उनका उर्दू तलफ़्फ़ुज ठीक है।

दिलीप कुमार को राखी लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) ने 1970 में बांधना शुरू की। इसके पीछे भी बड़ा कारण है। लता के उर्दू तलफ़्फ़ुज पर दिलीप कुमार की टीका लता को कतई पसंद नहीं आयी मगर वो छोटी थीं, नयी थीं और दिलीप कुमार से पहली बार मिल रही थीं। खैर लता ने उर्दू बोलना सीखा और उनके गाने में उर्दू शब्दों के उच्चारण भी सही हो गए लेकिन लता और दिलीप कुमार (Dilip Kumar) तब भी ज़्यादा बात नहीं करते थे।

साल 1957 में ऋत्विक घटक की विद्रोही कहानी मुसाफिर पर हृषिकेश मुखर्जी फिल्म बना रहे थे, ये उनकी पहली फिल्म थी। संगीत के लिए उन्होंने अपने मित्र और सुप्रसिद्ध संगीतकार सलिल चौधुरी को जोड़ा। फिल्म में तीन कहानियां थी और एक कहानी के हीरो थे दिलीप कुमार। फिल्म के हर पक्ष में दखल देने की दिलीप कुमार की आदत के चलते सलिल चौधुरी के साथ संगीत पर भी बात हुई।

गाने की एक सिचुएशन के लिए गाना चुना गया 'लागी नाही छूटे' जो राग पीलू पर आधारित था। ये राग भी दिलीप कुमार (Dilip Kumar) की पसंद था। रिकॉर्डिंग का दिन तय हुआ, दिलीप कुमार ने कई दिनों तक लगातार रिहर्सल भी की। लेकिन रिकॉर्डिंग के दिन लता मंगेशकर के साथ गाना गाने से वो असहज थे। काफी टालमटोल के बाद भी वो तैयार नहीं हो पाए।

सलिल चौधुरी ने उन्हें ड्रिंक पिलाकर थोड़ा जोश दिलाया, लेकिन रिकॉर्डिंग में उनकी आवाज बेसुरी और पतली सुनाई दी। रेकॉर्डिंग बर्बाद हो गयी। दिलीप कुमार, इस घटना के बाद लता (Lata Mangeshkar) से थोड़ा और नाराज रहने लगे।

लता और दिलीप कुमार ने करीब 13 सालों तक एक-दूसरे से कोई बात नहीं की। फिर एक दिन 1970 में लता ने दिलीप कुमार (Dilip Kumar) को राखी बांध इस पूरी लड़ाई का अंत कर दिया। दिलीप कुमार के अलावा लता मंगेशकर गायक मुकेश और संगीतकार मदन मोहन को भी राखी बांधती थी।

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