सपने देखते है सभी, पर सब सच कर नहीं पाते

Poetry on dream

सपने देखते है सभी
पर सब सच कर नहीं पाते,

सब जीते है उनमें
पर सब उनमें मर नहीं पाते,
खुशी चाहते है सभी
पर सब खुश रह नहीं पाते,
सपने देखते हैं सभी
पर सब सच कर नहीं पाते।

चोट खाते है सभी
पर सबके ज़ख्म भर नहीं पाते,
कुछ कर गुजरने की सोचते बहुत हैं
मगर सब कर नहीं पाते,
सपने देखते हैं सभी
पर सब सच कर नहीं पाते।

चाहते सभी बहुत कुछ हैैं
पर सब, हर कुछ पा नहीं पाते,
रोते है लोग खुलकर
पर कुछ टूटकर भी रो नहीं पाते,
सपने देखते है सभी
पर सब सच कर नहीं पाते!

Poetry By: Sakshi Sharma