गलियां-गलियां ढूंढे हैं मेरी नजर, फिर भी न जाना तू मेरी कदर

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गलियां-गलियां ढूंढे हैं मेरी नजर
फिर भी न जाना तू मेरी कदर
तुझको मैं ढूंढू हर गिरजे गुरुद्वारे
फिर भी न जाना तू मेरी कदर

पल-पल मैं रूप बदलू नए और अनोखा
चाहूं मैं तुझे ढूंढना हर नुक्कड़ हर मोहल्ले
फिर भी न तू मिले, तेरा आसरा है
सोचू मैं पल-पल तू सच है या कोई कहानी
जाना तू लगता है कोई मंजिल का सफर
गालियां-गालियां ढूंढे हैं मेरी नजर
फिर भी न जाना तू मेरी कदर

पल-पल पलकों को मूंद लूं
हर घड़ी में नए फसाने
चाहूं बस तुझे देखना
हर लम्हे और नजारे
तो अब है पलकें खोली, ख्वाबों का सहारा है
जाना तू लगता है एक मुकम्मल सफर

गलियां-गलियां ढूंढे हैं मेरी नजर
फिर भी न जाना तू मेरी कदर

Poetry By: Sakshi Sharma