शुभ संयोग: सोमवती अमावस्या पर शनि जयंती समेत मनाए जाएंगे 6 बड़े पर्व, जानें सभी का महत्व

Shanidev Somvati Amavasya
New Delhi: जून महीने की 3 तारीख दिन सोमवार को 6 पर्वों का शुभ संयोग बन रहा है। आज सोमवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या यानी सोमवती अमावस्या (Somvati Amavasya) के साथ शनि जयंती, रोहिणी व्रत, वट सावित्री व्रत, बड़मावस और भावुका अमावस्या का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन जप, तप, व्रत और साधना करने से मनुष्य को अक्षय पुण्य प्राप्त होता है।

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सोमवती अमावस्या

हिंदू पंचांग में अमावस्या तिथि का विशेष महत्व है। चंद्रमा की 16वीं कला को अमावस्या कहा जाता है। इस तिथि पर चंद्रमा की यह कला जल में प्रविष्ट हो जाती है। अमावस्या माह की तीसवीं तिथि है, जिसे कृष्णपक्ष के समाप्ति के लिए जाना जाता है। इस तिथि पर चंद्रमा और सूर्य का अंतर शून्य होता है। सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजन करने से श्री हरि की कृपा बरसती है। इस तिथि पर मां लक्ष्मी की साधना-आराधना भी सुख-समृद्धि दिलाने वाली होती है।

शनि जयंती

शनि को न्याय का देवता कहा जाता है। शनिदेव व्यक्ति को उसके कर्मो के हिसाब से फल अवश्य प्रदान करते हैं। भगवान शनिदेव का जन्मोत्सव हर साल हिंदू पंचांग के ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन मनाया जाता है। शनि जयंती पर शनि दर्शन और पूजा का विशेष महत्व होता है। जिन जातकों की कुंडली में शनि की महादशा, अंतर्दशा, साढ़ेसाती और ढैय्या चल रही होती है, इस दिन उनकी पूजा करने से शनि दोष से मुक्ति मिलती है।

वट सावित्री व्रत

अखंड सुहाग की कामना से प्रतिवर्ष सुहागिन महिलाओं द्वारा ज्येष्ठ मास की अमावस्या को वट सावित्री व्रत रखा जाता है। पवित्र बरगद और सावित्री-सत्यवान की पूजा के साथ इस दिन यमराज की भी पूजा होती है। इस दिन बरगद के वृक्ष की पूजा कर महिलाएं देवी सावित्री के त्याग, पति प्रेम एवं पति व्रत धर्म का स्मरण करती हैं। यह व्रत स्त्रियों के लिए सौभाग्यवर्धक, पापहारक, दुःखप्रणाशक और धन-धान्य प्रदान करने वाला होता है। इस व्रत में वट वृक्ष का बहुत महत्त्व होता है।

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बड़मावस

पृथ्वी पर वट वृक्ष को सबसे शक्तिशाली वृक्ष माना गया है। इस वृक्ष में सबसे ज्यादा धनात्मक ऊर्जा मानी गई है। मान्यता है कि बड़मावस का व्रत देवी सावित्री ने किया था। जिससे मिले आशीर्वाद से उनके पति के प्राण बच गए थे। इस पेड़ में बहुत सारी शाखाएं नीचे की तरफ लटकी हुई होती हैं, जिन्हें देवी सावित्री का रूप माना जाता है। वट वृक्ष की महत्ता इस प्रकार भी समझी जा सकती है कि श्री शुकदेव महाराज ने राजा परिक्षित वट वृक्ष के नीचे बैठकर ही श्रीमद्भागवत कथा को सुनाया था।

दर्श भावुका अमावस्या

सनातन परंपरा में जप-तप-साधना के लिए अमावस्या का अत्यंत महत्व है। दर्श अमावस्या के दिन चंद्रमा पूरी तरह नहीं दिखाई देता है। यदि कोई अमावस्या तिथि सूर्यास्त के बाद शुरू होती है और रात तक रहती है, तो चंद्रमा उस रात पूरी तरह से नहीं देखा जा सकता है। कहते हैं कि भावुक व्यक्ति पर अमावस्या का ज्यादा असर पड़ता है। चूंकि मन पर चंद्रमा का असर पड़ता है, ऐसे में चंद्रदेव की कृपा पाने के लिए व्रत रखते हैं और चंद्र दर्शन के दिन नए चंद्रमा को देखने के बाद इसे तोड़ते हैं।

रोहिणी व्रत

आकाश मंडल में स्थित 27 नक्षत्रों में रोहिणी चौथा नक्षत्र है। इसका स्वामी शुक्र है और नक्षत्र स्वामी चन्द्रमा है। जैन धर्म में रोहिणी व्रत का काफी महत्व है। महिलाएं अपने परिवार की खुशहाली और पति की मंगल कामना के लिए इस व्रत को विधि—विधान से रखती हैं। इस व्रत को 5 वर्ष 5 महीने तक किया जाता है। इस व्रत को करने वाले को वासुपूज्य देव की विधि विधान से पूजा करनी चाहिए और गरीबों को भोजन कराना चाहिए।