विज्ञान भी करता है हिंदू धर्म को सलाम, सरॉगसी से लेकर ट्रांसप्‍लांट तक.. सबकुछ है हिदुत्व की देन

Biotechnology Invention By Hindu Gods and Goddess
New Delhi: चिकित्‍सा और विज्ञान में आज हुई तरक्‍की का श्रेय भले ही चिकित्‍सकों और वैज्ञानिकों को जाता हो। लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि आज के समय में अविष्‍कार की गई इन 5 चीजों का सनातन धर्म (Biotechnology Invention By Hindu Gods and Goddess) से गहरा संबंध है।

यही नहीं पुराणों और शास्‍त्रों में तो इनकी उत्‍पत्ति का भी उल्‍लेख मिलता है। यानी कि आप कह सकते हैं कि विज्ञान की इन तकनीकों की खोज का श्रेय हिंदू देवी-देवता (Biotechnology Invention By Hindu Gods and Goddess) को जाता है। आइए जानते हैं कि ये कौन सी तकनीक हैं? इनकी उत्‍पत्ति कैसे हुई और किसने की?

सरॉगसी की शुरुआत

भारत में सरॉगसी की खोज भले ही 23 जून 1994 में हुई हो। लेकिन असल में इसकी नींव तो हजार साल पहले द्वापर युग में ही रखी जा चुकी थी। भगवत पुराण के अनुसार सरॉगसी की प्रथा कंस की बहन राजकुमारी देवकी ने शुरू की थी।

कथा मिलती है कि जब कंस ने अपनी मृत्‍यु के भय से देवकी और वसुदेव के सारे पुत्रों का वध कर रहा था। तब माता देवकी ने अपनी 7वीं संतान के भ्रूण को वसुदेव की दूसरी पत्‍नी जो कि गोकुल में रह रही थीं। उनके गर्भ में प्रत्‍यारोपित करवा दिया था। यह कार्य योगमाया के द्वारा संपन्‍न हुआ था। देवकी की यह संतान कोई और नहीं बल्कि शेषनाग अवतार बलराम थे।

ह्यूमन क्‍लोनिंग की शुरुआत

विश्‍व में एनमिल क्‍लोनिंग की शुरुआत साल 1952 में हुई थी। ह्यूमन क्‍लोनिंग अभी भी प्रक्रिया में है। फिलहाल किसी तरह का कोई सार्थक परिणाम नहीं मिला है। लेकिन महाभारत काल की बात करें तो यह दौर ह्यूमन क्‍लोनिंग का साक्षी बना। कथा का संबंध कौरवों के जन्‍म से है।

गांधारी जब गर्भवती थीं तो दो साल बाद उन्‍होनें मांस के टुकड़े को जन्‍म दिया। इससे सभी अत्‍यंत दु:खी हुए। तब ऋषि व्‍यास ने मांस के उस टुकड़े को 100 भाग में विभाजित किया। इसके बाद उसे घी और अन्‍य जड़ी-बूटियों का लेप लगाकर दो साल के लिए अलग-अलग पॉट्स में रख दिया। जब दो साल का समय पूरा हुआ तो उन मिट्टी के बर्तन में रखे गए मांस के वह टुकड़े गांधारी के 100 पुत्र बनें।

क्‍लोनिंग की कला का आरंभ

गांधारी के 100 पुत्र कौरवों के अलावा राक्षस रक्‍तबीज की भी कथा मिलती है। जो कि क्‍लोनिंग की कला को जानता था। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जब मां दुर्गा और रक्‍तबीज के बीच युद्ध चल रहा था। तब जब भी माता उसपर प्रहार करतीं तो जमीन पर जितनी भी रक्‍त की बूंदें गिरतीं उतने ही रक्‍तबीज पैदा होते जाते।

तब माता भगवती ने देवी काली का आवाह्न करके उन्‍हें रक्‍तबीज के रक्‍तपान का आदेश दिया। उन्‍होंने मां काली को रक्‍तभूमि पर गिरने से पहले ही पी लेने को कहा। ताकि दूसरे रक्‍तबीज जन्‍म न ले सकें।

ट्रांसप्‍लांट के जनक

कथा मिलती है माता पार्वती की। उन्‍होंने चंदन से भगवान श्रीगणेश को बनाया। इसके बाद वह स्‍नान के लिए जाने लगीं तब उन्‍होंने गणेश जी को यह आदेश दिया कि वह दरवाजे पर ही रहें और किसी को भी भीतर प्रवेश न दें। इसके बाद वह स्‍नान के लिए चली गईं। तभी भगवान शिव वापस लौटे और भीतर प्रवेश करने लगे।

गणेश जी ने उन्हें अंदर जाने से मना कर दिया। उन्‍होंने कहा कि माता का आदेश है कि कोई भी अंदर प्रवेश न करें। भगवान शिव ने बहुत प्रयास किया। लेकिन गणेश जी नहीं मानें और क्रोधित होकर भोलेनाथ ने भगवान गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया। यह दृश्‍य देखते ही माता पार्वती अत्‍यंत क्रोधित हो गईं और वह संपूर्ण सृष्टि का विनाश करने निकल पड़ीं।

ऐसे शांत हुआ माता पार्वती का क्रोध

इसके बाद भगवान ब्रह्मा ने माता को क्रोध शांत करने का निवेदन किया। तब मां ने उन्‍हें गणेश जी को पुर्नजीवित करने और देवताओं में प्रथम पूजने की बात रखी। इस बात को स्‍वीकारते हुए ब्रह्मदेव ने भोलेनाथ से कहा कि इस सृष्टि में जो भी पहला ऐसा व्‍यक्ति दिखे जो उत्‍तर दिशा की तरफ सिर करके बैठा हो वह उसका सिर लेकर आएं और गणेश जी को वह प्रत्‍योरोपित कर दिया जाएगा।

इसी खोज में निकले शिव जी को संपूर्ण सृष्टि में केवल एक हाथी ही ऐसा दिखा जो कि ब्रह्मदेव के मुताबिक उत्‍तर दिशा में सिर करके बैठा था। इसके बाद शिव जी ने हाथी के सिर को भगवान गणेश जी के धड़ पर प्रत्‍यारोपित किया। हालांकि चिकित्‍साशास्‍त्र में अभी इस विषय पर शोध जारी है।

शरीर के अंगों के जनक भी देवता और राक्षस

सनातन धर्म के अनुसार देवताओं और राक्षसों को शरीर के अंगों का जनक माना जाता है। कथाओं में इसके पीछे का तर्क मिलता है। जब कभी युद्ध या फिर किसी अन्‍य कारण से किसी देवी-देवता या फिर राक्षसों के शरीर का कोई अंग भंग हो जाता था। तब वह स्‍वयं ही उस अंग को उत्‍पन्‍न कर लेते थे। इससे उनके शरीर में किसी तरह का अंग भंग पता ही नहीं चलता था।

चिकित्‍साशास्‍त्र में भी ह्यूमन बॉडी सेल्‍स को दोबारा उत्‍पन्‍न करने के बारे में शोध चल रहा है। हालांकि पौधों और वन्‍यजीवों पर यह प्रक्रिया अपनाई जा चुकी है।

आनुवंशिक आभियांत्रिकी विज्ञान के जनक शिव

जेनेटिक इंजीनियरिंग यानी कि आनुवंशिक आभियांत्रिकी विज्ञान का जनक भी भगवान शिव को माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा दक्ष प्रजापति ने एक बार यज्ञ का आयोजन किया था। इसमें सभी देवताओं को आमंत्रित किया था लेकिन शिव जी को निमंत्रण नहीं भेजा था। माता सती को जब पता चला कि उनके पिता के घर पर यज्ञ है तो वह बिना निमंत्रण पत्र के लिए अपने मायके जाने को तैयार हुईं।

शिव जी के लाख समझाने पर भी वह नहीं मानीं और मायके से निमंत्रण पत्रिका की जरूरत नहीं होती यह तर्क देकर वह चली गईं। माता सती जब पहुंची तो वहां किसी ने भी उनका सम्‍मान नहीं किया। न ही भगवान शिव के बारे में पूछा। इस अपमान को वह बर्दाश्‍त नहीं कर सकीं। उन्‍होंने यज्ञ में आत्‍मदाह कर लिया।

शिव ने ऐसे दिया वीरभद्र को जन्‍म

इसकी खबर मिलते ही शिव जी अत्‍यंत क्रोधित हो गए। उन्‍होंने अपने बाल से वीरभद्र को जन्‍म दिया। वीरभद्र की तीन आंखें थीं जो कि अग्नि के समान ज्‍वलंत थीं। इसके अलावा उसने मुंडों की माला के साथ बहुत सारे हथियार धारण किये हुए थे। इस तरह अपने जीन से शिव जी ने वीरभद्र को जन्‍म देकर आनुवंशिक आभियांत्रिकी विज्ञान की शुरुआत की।

वर्तमान में जेनटिक इंजीनियरिंग बेहद कॉमन विधा बन गई है। वैज्ञानिकों ने कई सारी नस्‍लों पर जीन का प्रयोग भी किया है। लेकिन वास्‍तविकता में जेनटिक इंजीनियरिंग का श्रेय सनातन धर्म को ही जाता है।