जगन्नाथ रथ यात्रा: जानें कैसे शुरू हुई भगवान जगन्नाथ की भव्य यात्रा, इस कथा में छिपा है रहस्य

Lord Jagannath Yatra
New Delhi: ओडिशा के पुरी में गुरुवार (4 जुलाई) से रथ यात्रा (Jagannath Rath Yatra) शुरू हो गई है। ये रथ यात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को जग्गनाथ पुरी से शुरू होती है।

पुरी के अलावा गुजरात में भी ऐसी भव्य यात्रा (Jagannath Rath Yatra) का आयोजन होता है। रथयात्रा में शामिल होने के लिए देश-विदेश से लोग पहुंचते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद सहित कई नेताओं ने देशवासियों को ट्वीट कर रथयात्रा की शुभकामनाएं दीं।

इस रथयात्रा उत्सव में भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath) को रथ पर विराजमान करके पूरे नगर में भ्रमण कराया जाता है। रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ के अलावा उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के रथ भी निकाले जाते हैं। रथयात्रा जगन्नाथ मंदिर से शुरू होकर गुण्डिच्चा मंदिर तक पहुंचती है।

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पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकालने की यह परंपरा काफी पुरानी है और वर्षों से चली आ रही है। इस पवित्र रथ यात्रा से जुड़ी कई मान्यताएं प्रचलित है। आइए जानते हैं कैसे शुरू हुई विश्व प्रसिद्ध जगन्ननाथ यात्रा और क्या है इसका इतिहास…

जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी कथा

कलयुग के प्रारंभिक काल में मालव देश पर राजा इंद्रद्युम का शासन था। वह भगवान जगन्नाथ का भक्त था। एक दिन इंद्रद्युम भगवान के दर्शन करने नीलांचल पर्वत पर गया तो उसे वहां देव प्रतिमा के दर्शन नहीं हुए। निराश होकर जब वह वापस आने लगा तभी आकाशवाणी हुई कि शीघ्र ही भगवान जगन्नाथ मूर्ति के स्वरूप में पुन: धरती पर आएंगे। यह सुनकर वह खुश हुआ।

आकाशवाणी के कुछ दिनों बाद एक बार जब इंद्रद्युम पुरी के समुद्र तट पर टहल रहा थे, तभी उसे समुद्र में लकड़ी के दो विशाल टुकड़े तैरते हुए दिखाई दिए। तब उन्हें आकाशवाणी की याद आई और सोचा कि इसी लकड़ी से वह भगवान की मूर्ति बनवाएगा। फिर वह लकड़ी को महल में अपने साथ उठा लाएं तभी भगवान की आज्ञा से देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा वहां बढ़ई के रूप में प्रगट हुए और उन्होंने उन लकडिय़ों से भगवान की मूर्ति बनाने के लिए राजा से कहा। राजा ने तुरंत इसकी आज्ञा दी।

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लेकिन मूर्ति बनाने से पहले बढ़ई रूपी विश्वकर्मा ने एक शर्त रख दी। शर्त के मुताबिक वह मूर्ति का निर्माण एकांत में ही करेगा और यदि निर्माण कार्य के दौरान कोई वहां आया तो वह काम अधूरा छोड़कर चला जाएगा। राजा ने शर्त मान ली। इसके बाद विश्वकर्मा ने गुण्डिचा नामक जगह पर मूर्ति बनाने का काम शुरू कर दिया। कुछ दिन बाद एक दिन राजा भूलवश जिस स्थान पर विश्वकर्मा मूर्ति बना रहे थे वहां पहुंच गए। तब उन्हें देखकर विश्वकर्मा वहां से अन्तर्धान हो गए और भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां अधूरी रह गईं।

तभी आकाशवाणी हुई कि भगवान इसी रूप में स्थापित होना चाहते हैं। तब राजा इंद्रद्युम ने विशाल मंदिर बनवाकर तीनों मूर्तियों को वहां स्थापित कर किया। साथ यह भी आकाशवाणी हुई कि भगवान जगन्नाथ साल में एक बार अपनी जन्मभूमि जरूर आएंगे। स्कंदपुराण के उत्कल खंड के अनुसार राजा इंद्रद्युम ने आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन प्रभु के उनकी जन्मभूमि जाने की व्यवस्था की। तभी से यह परंपरा रथयात्रा के रूप में चली आ रही है।

अन्य कथा

वहीं एक दूसरी कथा भी जिसके अनुसार सुभद्रा के द्वारिका दर्शन की इच्छा पूरी करने के लिए श्रीकृष्ण और बलराम ने अलग-अलग रथों में बैठकर यात्रा की थी। सुभद्रा की नगर यात्रा की स्मृति में ही यह रथयात्रा पुरी में हर साल होती है।