जब भगवान गणेश ने लिया स्त्री अवतार, पढ़ें ये पौराणिक कथा

Lord Ganesha religious story
New Delhi: सनातन धर्म में कोई शुभ कार्य से पहले भगवान गणेश (Lord Ganesha) की वंदना की जाती हैं। पुराणों में श्रीगणेश को सर्वप्रथम देवता माना गया है। गणेशजी को कई स्वरूप में पूजा जाता है।

आज हम आपको गणेशजी (Lord Ganesha) के ऐसे स्वरूप के बारे में बता रहे हैं, जिसके बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि गणेशजी एक स्त्री अवतार भी है, जिसकी भक्त पूजा करते हैं। उनके स्त्री अवतार को विनायकी कहा जाता है। गणेशजी के इस स्वरूप की पूजा मुख्यत काशी और उड़ीसा में की जाती हैं। विनायकी देवी ने एक हाथ में परशु और दूसरे हाथ में कुल्हाड़ी धारण किया हुआ है।

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कई जगह है भगवान गणेश के ऐसे मंदिर

पौराणिक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु से लेकर इंद्र तक को किसी न किसी कारण स्त्री रूप धारण करना पड़ा था। वहीं, गणेशजी ने भी देवी पार्वती की रक्षा के लिए स्त्री रूप धारण किया था। भगवान गणेश के स्त्री रूप की प्रतिमा देश के कई मंदिरों में विराजमान हैं, जिसमें तमिलनाडू स्थित चिदंबरम मंदिर, जबलपुर स्थित चौसठ योगिनी मंदिर आदि शामिल हैं। उनका एक मंदिर बिलासपुर के पास भी बनाया गया है।

मां पार्वती को बचाने गणेश ने लिया था स्त्री रूप

धर्मोत्तर पुराण में गणेशजी के विनायकी रूप का उल्लेख मिलता है। वहीं, वन दुर्गा उपनिषद में भी गणेश्वरी का नाम दिया गया है। इतना ही नहीं, मत्स्यपुराण में भी गणेशजी के इसी स्त्री रूप का वर्णन किया गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार अंधक नामक दैत्य देवी पार्वती को अपनी अर्धांगिनी बनाने का इच्छुक हुआ और जबर्दस्ती पार्वती को अपनी पत्नी बनाने की कोशिश की। पार्वती ने मदद के लिए अपने पति शिव जी को बुलाया।

माता पार्वती ने दैवीय शक्तियों को बुलाया

अपनी अर्धांगनी को दैत्य से बचाने के लिए शिवजी ने अपना त्रिशूल उठाया और राक्षस के आरपार कर दिया। लेकिन वह राक्षस मरा नहीं, बल्कि उसके रक्त की एक-एक बूंद एक राक्षसी ‘अंधका’ में बदलती चली गई। राक्षसी का वध करने के लिए उसके खून की बूंद को जमीन पर गिरने से रोकना था, जो संभव नहीं था। देवी पार्वती जानती थीं कि हर एक दैवीय शक्ति के दो तत्व होते हैं। पहला पुरुष तत्व जो उसे मानसिक रूप से सक्षम बनाता है और दूसरा स्त्री तत्व, जो उसे शक्ति प्रदान करता है। इसलिए पार्वती ने उन सभी देवियों को बुलाया किया जो शक्ति का रूप हैं।

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भगवान गणेश ने लिए स्त्री रूप

देवी पार्वती के बुलावे पर वहां हर दैवीय शक्ति के स्त्री रूप आ गए, जिन्होंने राक्षस के खून को गिरने से पहले ही अपने भीतर समा लिया। फलस्वरूप अंधका का उत्पन्न होना कम हो गया। लेकिन, इसके बावजूद अंधक के रक्त को खत्म करना संभव नहीं हो रहा था। अंत में भगवान गणेशजी अपने स्त्री रूप ‘विनायकी’ में प्रकट हुए और उन्होंने अंधक का सारा रक्त पी लिया। इस प्रकार से देवताओं के लिए अंधका का सर्वनाश करना संभव हो सका। गणेश जी के विनायकी रूप को सबसे पहले 16वीं सदी में पहचाना गया।