सावन 2019: भगवान शिव की वेशभूषा में शामिल हैं ये 7 चीजें, शर्त लगा लो नहीं जानते आप

Lord Shiva
New Delhi: सावन (Sawan 2019) में भगवान शिव (Lord Shiva) के भक्त पूजा-अर्चना में व्यस्त हैं। सावन के पूरे महीने भोले शंकर के साथ-साथ शिव परिवार की भी आराधना की जाएगी। सावन पर भोले बाबा को लेकर कई तरह की कथाएं प्रचलित हैं।

मगर उनके पहनावे को लेकर कुछ ऐसी बातें हैं जिन पर अधिकतर लोगों का ध्यान नहीं गया होगा। शिव शंकर का पहनावा सबसे अलग है। आइए जानते हैं भोलेनाथ (Lord Shiva) की वेशभूषा से जुड़ी वो 7 बातें जिन पर अधितर लोगों का ध्यान नहीं जाता…

चंद्रमा

शिव भगवान (Lord Shiva) के कई नाम हैं, इनमें से एक सोम भी है। इसलिए भोले को सोमवार का दिन सबसे ज्यादा प्रिय है। दरअसल सोम का अर्थ चंद्रमा होता है। यह मन का कारक होता है। भोले का चंद्रमा को धारण करने का मतलब मन पर नियंत्रण को लेकर है। यह इसका प्रतीक माना जाता है।

यह भी पढ़े: विदेशों में मौजूद हैं भोलेनाथ के 6 प्रसिद्ध मंदिर, इन्हें देखने आते हैं करोड़ों श्रद्धालु

जटा

शंकर भगवान अंतरिक्ष के देवता हैं। भोले का एक नाम व्योमकेश भी है। उनकी जटाएं आकाश की तरह हैं, जो कि वायुमंडल का प्रतीक है।

त्रिशूल

त्रिशूल भोले का अस्त है। इसकी शक्ति के आगे कोई भी नहीं ठहर सका है। इससे जुड़ी कुछ अहम बातें हैं जो अधिकतर लोग नहीं जानते हैं। त्रिशूल 3 प्रकार के कष्टों दैनिक, दैविक, भौतिक के विनाश का सूचक है। इसमें 3 तरह की शक्तियां हैं- सत, रज और तम।

त्रिपुंड तिलक

भगवान शिव के माथे पर त्रिपुंड तिलक हमेशा लगा रहता है। यह तीन लंबी धारियों वाला तिलक होता है, जोकि त्रिलोक्य और त्रिगुण का प्रतीक माना जाता है। यह सतोगुण, रजोगुण और तपोगुण का प्रतीक भी है। यह त्रिपुंड सफेद चंदन का या भस्म का होता है।

यह भी पढ़े: हरिद्वार जानें वाले श्रद्धालु जरुर करें इन मंदिरों के दर्शन, सभी दोषों से मिलेगी मुक्ति

डमरू

डमरू भगवान शिव का प्रिय वाद्य यंत्र है। यह नाद का प्रतीक है। भोले नाथ को संगीत का जनक माना जाता है। मान्यता है कि शंकर भगवान से पहले किसी को भी नाचना, गाना या बजाना नहीं आता था। भगवान शिव दो तरह के नृत्य करते हैं। इसका एक प्रकार नाद है। नाद अर्थात ऐसी ध्वनि, जो ब्रह्मांड में निरंतर जारी है। इसे ‘ॐ’ कहा जाता है।

गंगा

जब गंगा को स्वर्ग से धरती पर लाने का प्रयास किया जा रहा था तब प्रश्न उठा कि गंगा के तीव्र वेग को धरती कैसे संभालेगी। इससे धरती में विशाल छिद्र हो सकता है और गंगा पाताल में समा जाएगीं। इसलिए भगवान शिव से इस समस्या का हल निकालने की प्रार्थना की गई। शिव भगवान मान गए और उन्होंने स्वर्ग से उतरते समय गंगा को अपनी जटाओं में समा लिया। इसके पश्चात गंगा का धरती पर प्रवाह संभव हुआ।

यह भी पढ़े: सावन 2019: जानें शिव चालीसा का पाठ करने से होते हैं कौन-कौन से फायदे

भभूत (भस्म)

भोले शंकर शरीर पर भस्म लगाते हैं। यह निस्सारता का बोध कराती है। भस्म मोह और आकर्षण से मुक्ति का भी प्रतीक है। भारत के उज्जैन में भगवान शिव का एक मात्र मंदिर है जहां भस्म से आरती की जाती है। यहां श्मशान की भस्म का उपयोग किया जाता है।

नोट: हमारा उद्देश्य किसी भी तरह के अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। यह लेख लोक मान्यताओं और पाठकों की रूचि के आधार पर लिखा गया है।