भोलेनाथ को समर्पित है उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर, यहां भस्म आरती का है खास महत्व

Mahakaal mandir ujjain shiva
New Delhi: भगवान शिव को महाकाल नाम से भी जाना जाता है। मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर (Mahakaleshwar Jyotirlinga Temple) भोलेनाथ के इसी रूप को समर्पित है।

इस स्वयंभू ज्योतिर्लिंग (Mahakaleshwar Jyotirlinga Temple) के बारे में कई पौराणिक ग्रंथों में वर्णित है। देश-दुनिया से यहां सभी महाकाल यानी भगवान शिव के दर्शन हेतू आते हैं, लेकिन कुंभ मेले के दौरान यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ जाती है।

यह भी पढ़े: नीलकंठ महादेव मंदिर: इसी पौराणिक स्थान पर शिव ने पिया था कालकूट विष और कहलाए नीलकंठ

लोक एवं पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मंदिर से जुड़ी कई किंवदंती सुनने को मिलती हैं। इस कारण से यह मंदिर, पर्यटकों की सूची में सबसे ऊपर आता है। आइए, जानते हैं क्या है महाकालेश्वर मंदिर से जुड़े रहस्य, जिन्हें आज तक कोई नहीं भेद सका…

ऐसा है निर्माण

भगवान शिव के 12 पौराणिक ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर मंदिर में दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग के दर्शन होते हैं। तीन हिस्सों में विभाजित इस मंदिर के ऊपरी हिस्से में नाग चंद्रेश्वर मंदिर, नीचे ओंकारेश्वर मंदिर और सबसे नीचे महाकाल मुख्य ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हैं। यहां भगवान शिव के साथ गणेशजी, कार्तिकेय और माता पार्वती की मूर्तियों के भी दर्शन होते हैं। इसके साथ ही यहां एक कुंड भी है जिसमें स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं।

ऐसे हुए थे प्रकट

लोक कथाओं के अनुसार, दूषण नामक असुर से लोगों की रक्षा के ल‌िए भोलेनाथ यहां महाकाल के रूप में प्रकट हुए थे। दूषण का वध करने के बाद भक्तों ने श‌िवजी से उज्‍जैन में ही वास करने की प्रार्थना की तो भगवान शिव महाकाल ज्योत‌िर्ल‌िंग के रूप में विराजमान हुए। ऐसे उज्जैन का शास्त्रों में वर्णन भगवान श्रीकृष्ण को लेकर भी मिलता है, क्योंकि उनकी शिक्षा यहीं हुई थी।

इसलिए है इतना प्रसिद्ध

प्राचीनकाल से धार्मिक नगरी माने जाने वाले उज्जैन के इस पौराणिक मंदिर में भस्म आरती के दुर्लभ पलों का साक्षी बनने का ऐसा सुनहरा अवसर और कहीं नहीं प्राप्त होता है। मान्यता है कि जो इस आरती में शामिल हो जाए उसके सभी कष्ट दूर होते हैं, इसके बिना आपके दर्शन पूरे भी नहीं माने जाते हैं। इसके अलावा यहां नाग चंद्रेश्वर मंदिर और महाकाल की शाही सवारी आदि भी पर्यटकों में जिज्ञासा का विषय बने रहे हैं।

यह भी पढ़े: शिवजी समेत इन देवताओं से डरते हैं शनिदेव, कभी नहीं डालते इनके भक्तों पर बुरी नजर

क्यों होती है भस्म आरती

रोजाना प्रातकाल महाकाल की भस्म आरती कर उन्हें जगाया जाता है। भस्म आरती के लिए पहले शमशान से भस्म लाने की परंपरा थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर की लकड़‌ियों को जलाकर तैयार क‌िए गए भस्‍म को कपड़े से छानने के बाद इस्तेमाल की जा रही है। दरअसल भस्म को सृष्टि का सार माना जाता है, इसलिए प्रभु हमेशा इसे धारण किए रहते हैं।

यह है खास नियम

महाकाल के इस मंदिर में कड़े नियम हैं। महिलाओं को आरती के समय घूंघट करना पड़ता है। दरअसल महिलाएं इस आरती को नहीं देख सकती हैं। इसके साथ ही आरती के समय पुजारी भी मात्र एक धोती में आरती करते हैं। अन्य किसी भी प्रकार के वस्त्र को धारण करने की मनाही रहती है। महाकाल की भस्म आरती के पीछे एक यह मान्यता भी है कि भगवान शिवजी श्मशान के साधक हैं, इस कारण से भस्म को उनका श्रृंगार-आभूषण माना जाता है। इसके साथ ही ऐसी मान्यता है कि ज्योतिर्लिंग पर चढ़े भस्म को प्रसाद रूप में ग्रहण करने से रोग दोष से भी मुक्ति मिलती है।