ISRO रचेगा नया इतिहास, चांद के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाला दुनिया का पहला देश बनेगा भारत

ISRO chandrayan 2
New Delhi: चांद पर भारत के दूसरे महत्वाकांक्षी मिशन चंद्रयान-2 (Chandrayaan-2) को सोमवार को श्रीहरिकोटा से सबसे शक्तिशाली रॉकेट जीएसएलवी-मार्क III-एम1 के जरिए प्रक्षेपित किया जायेगा।

चेन्नई से लगभग 100 किलोमीटर दूर सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र में दूसरे लांच पैड से चंद्रयान-2 (Chandrayaan-2) का प्रक्षेपण दोपहर दो बजकर 43 मिनट पर किया जायेगा। इस मिशन की लागत 978 करोड़ रुपये है।

यह भी पढ़ें : Apollo 11 Space Mission: चांद पर कैसे पहुंचे नील आर्मस्ट्रॉन्ग, जानें कैसा था वो ऐतिहासिक सफर

एक सप्ताह पहले तकनीकी गड़बड़ी आने के बाद चंद्रयान-2 (Chandrayaan-2) का प्रक्षेपण रोक दिया गया था। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के वैज्ञानिकों ने 15 जुलाई को मिशन के प्रक्षेपण से 56 मिनट 24 सेकंड पहले मिशन नियंत्रण कक्ष से घोषणा के बाद रात 1.55 बजे इसे रोक दिया था। कई दिग्गज वैज्ञानिकों ने इस कदम के लिए इसरो की प्रशंसा भी की थी। उनका कहना था कि जल्दबाजी में कदम उठाने से बड़ा हादसा हो सकता था।

भारत का चंद्रयान -2 प्रक्षेपण होने के बाद चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के करीब लैंडिग करेगा। इस जगह पर इससे पहले किसी भी देश का कोई यान नहीं पहुंचा है।

विक्रम लैंडर के अलग हो जाने के बाद, यह एक ऐसे क्षेत्र की ओर बढ़ेगा जिसके बारे में अब तक बहुत कम खोजबीन हुई है। ज्यादातर चंद्रयानों की लैंडिंग उत्तरी गोलार्ध में या भूमध्यरेखीय क्षेत्र में हुई हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की ओर से एक अधिकारी ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के करीब स्थान चुनने के बारे में बताया “। इस बार हम एक ऐसे स्थान पर जा रहे हैं जहां पहले कोई नहीं गया है।”

ISRO प्रमुख के. सिवन ने कहा, “विक्रम का 15 मिनट का अंतिम तौर पर उतरना सबसे ज़्यादा डराने वाले पल होंगे, क्योंकि हमने कभी भी इतने जटिल मिशन पर काम नहीं किया है”

लैंडिंग के बाद, रोवर चांद की मिट्टी का रासायनिक विश्लेषण करेगा। वहीं लैंडर चंद्रमा की झीलों को मापेगा और अन्य चीजों के अलावा लूनर क्रस्ट में खुदाई करेगा।

यह भी पढ़ें : जहां आजतक नहीं पहुंच पाया दुनिया का कोई देश, चांद के उस हिस्से पर उतरेगा भारत का चंद्रयान

2009 में चंद्रयान -1 के बाद चंद्रमा की सतह पर पानी के अणुओं की मौजूदगी का पता लगाने के बाद से भारत ने भारत ने चंद्रमा की सतह पर पानी की खोज जारी रखी है। चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी से ही भविष्य में यहां मनुष्य के रहने की संभावना बन सकती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2022 तक मानव को अंतरिक्ष में भेजने की बात कही है। अधिकतर विशेषज्ञों का कहना है कि इस मिशन से मिलने वाला जियो-स्ट्रैटेजिक फायदा ज़्यादा नहीं है, लेकिन भारत का कम खर्च वाला यह मॉडल कमर्शियल उपग्रहों और ऑरबिटिंग डील हासिल कर पाएगा।

बता दें ‘चंद्रयान 2’ (Chandrayaan-2) का ऑरबिटर, लैंडर और रोवर लगभग पूरी तरह भारत में ही डिज़ाइन किए गए और बनाए गए हैं, और वह 2.4 टन वज़न वाले ऑरबिटर को ले जाने के लिए अपने सबसे ताकतवर रॉकेट लॉन्चर – GSLV Mk III – का इस्तेमाल करेगा। ऑरबिटर की मिशन लाइफ लगभग एक साल है।

13 या 14 सितंबर को करेगा लैंडिंग

चंद्रयान-2 13 या 14 सितंबर को चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव के पास लैंड करेगा। ऐसा होते ही भारत चांद की सतह पर लैंडिंग करने वाला चौथा देश बन जाएगा। इससे पहले अमेरिका, रूस और चीन अपने यानों को चांद की सतह पर भेज चुके हैं। हालांकि कोई भी देश अब तक चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास यान नहीं उतार पाया है। ISRO ने 2009 में चंद्रयान-1 को चंद्रमा की परिक्रमा करने के लिए भेजा था लेकिन चांद की सतह पर उतारा नहीं गया था।

क्या है मकसद, क्या करेगा चंद्रयान
  • चंद्रयान-2 चंद्रमा की सतह पर पानी के प्रसार और मात्रा का अध्ययन करेगा।
  • चंद्रमा के मौसम का अध्ययन करेगा।
  • चंद्रमा की सतह में मौजूद खनिजों और रासायनिक तत्‍वों का अध्‍ययन करेगा।
  • चंद्रमा के बाहरी वातावरण का अध्ययन करेगा।
बाहुबली रॉकेट से भेजा जाएगा चंद्रयान-2
  • ISRO के GSLV Mk III रॉकेट से चंद्रयान-2 को चंद्रमा पर भेजा जाएगा। इस रॉकेट को बाहुबली रॉकेट कहा जाता है।
चंद्रयान-2 की खास बातें
  • वजन – 3800 किलो
  • GSLV Mk III लॉन्चर
  • कुल कितना खर्च: 603 करोड़ रुपये
  • चंद्रमा की सतह से 100Km ऊंचाई वाली कक्षा में चक्कर लगाएगा
  • इस मिशन के साथ 13 पेलोड भेजे जाएंगे। इनमें से 8 पेलोड ऑर्बिटर में, 3 लैंडर में और 2 रोवर में रहेंगे।
चंद्रयान-2 में 3 मॉड्यूल आर्बिटर, लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) होंगे। जानें तीनों के क्या काम होंगे-
ऑर्बिटर
  • वजन- 2379 किलो
  • मिशन की अवधि – 1 साल

आर्बिटर चंद्रमा की सतह से 100 किलोमीटर की ऊंचाई वाली कक्षा में चक्कर लगाएगा। इसका काम चांद की सतह का निरीक्षण करना और खनिजों का पता लगाना है। इसके साथ 8 पेलोड भेजे जा रहे हैं, जिनके अलग-अलग काम होंगे। इसके जरिए चांद के अस्तित्व और उसके विकास का पता लगाने की कोशिश होगी। बर्फ के रूप में जमा पानी का पता लगाया जाएगा। बाहरी वातावरण को स्कैन किया जाएगा।

यह भी पढ़ें : सोनभद्र नरसंहार: प्रियंका गांधी की गिरफ्तारी पर सियासी बवाल, जानें अहम बातें

लैंडर (विक्रम)
  • वजन- 1471 किलो
  • मिशन की अवधि – 15 दिन

इसरो का यह पहला मिशन है, जिसमें लैंडर जाएगा। लैंडर आर्बिटर (विक्रम) से अलग होकर चंद्रमा की सतह पर उतरेगा। विक्रम लैंडर चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करेगा। यह 2 मिनट प्रति सेकेंड की गति से चंद्रमा की सतह पर उतरेगा। विक्रम लैंडर के अलग हो जाने के बाद, यह एक ऐसे क्षेत्र की ओर बढ़ेगा जिसके बारे में अब तक बहुत कम खोजबीन हुई है। लैंडर चंद्रमा की झीलों को मापेगा और अन्य चीजों के अलावा लूनर क्रस्ट में खुदाई करेगा।

रोवर (प्रज्ञान)
  • वजन- 27 किलो
  • मिशन की अवधि – 15 दिन (चंद्रमा का एक दिन)

प्रज्ञान नाम का रोवर लैंडर से अलग होकर 50 मीटर की दूरी तक चंद्रमा की सतह पर घूमकर तस्वीरें लेगा। चांद की मिट्टी का रासायनिक विश्लेषण करेगा। रोवर के लिए पावर की कोई दिक्कत न हो, इसके लिए इसे सोलर पावर उपकरणों से भी लैस किया गया है।