Republic Day 2020: कभी सोचा है कहां बनता है देश की शान तिरंगा, नहीं जानते तो यहां मिलेगा जवाब

Manufacturing Place of Tricolor
New Delhi: किसी भी देश की पहचान उसके राष्ट्रीय ध्वज से की जाती है। हमारा तिरंगा (Manufacturing Place of Tricolor) भी देश की आन-बान और शान बनकर विश्व पटल पर सवा सौ करोड़ भारतीयों की पहचान बना है। भारत 26 जनवरी को अपना 71वां गणतंत्र दिवस (Republic Day 2020) मना रहा है।

26 जनवरी (Republic Day 2020) के दिन बच्चे से लेकर बूढ़ा भी देशभक्ति के रंग में डूबा रहता है और तिरंगा फहराता है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि तिरंगा कहां और कैसे बनता है? नहीं जानते, तो चलिए हम बताते हैं आपको तिरंगे का अद्भुत सफर…

यहां बनता है तिरंगा

कर्नाटक के हुबली शहर के बेंगेरी इलाके में स्थित कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग संयुक्‍त संघ (फेडरेशन) यानी KKGSS राष्ट्रध्वज ‘तिरंगा’ बनाती है। KKGSS खादी व विलेज इंडस्‍ट्रीज कमीशन द्वारा सर्टिफाइड देश की अकेली ऑथराइज्‍ड नेशनल फ्लैग मैन्‍युफैक्‍चरिंग यूनिट है। यानी इसके अलावा राष्ट्रीय ध्वज कोई और नहीं बनाता है। इसे हुबली यूनिट भी कहा जाता है।

2005 से यहीं बन रहा है तिरंगा

KKGSS की स्‍थापना नवंबर 1957 में हुई थी। 1982 से यहां खादी बनाना शुरू किया गया।2005-06 में इसे ब्‍यूरो ऑफ इंडियन स्‍टैंडर्ड्स (BIS) से सर्टिफिकेशन मिला और इसने राष्‍ट्रीय ध्‍वज बनाना शुरू किया। देश में जहां कहीं भी आधिकारिक तौर पर राष्‍ट्रीय ध्‍वज इस्‍तेमाल होता है, यहीं के बने झंडे की सप्‍लाई की जाती है। विदेशों में मौजूद इंडियन एंबेसीज यानी भारतीय दूतावासों के लिए भी यहीं से तिरंगे बनकर जाते हैं। कोई भी ऑर्डर कर कुरियर के जरिए ​राष्ट्रीय ध्वज KKGSS खरीद सकता है।

धागा व कपड़ा बनाने की यूनिट अलग

KKGSS की बागलकोट यूनिट भी है, जहां हाई क्‍वालिटी के कच्‍चे कॉटन से धागा बनाया जाता है। धागा हाथ से मशीनों और चरखा चलाकर बनाया जाता है। गाडनकेरी, बेलॉरू, तुलसीगिरी यूनिट में कपड़ा तैयार होता है। फिर हुबली यूनिट में कपड़े की डाइंग व अन्य प्रॉसेस की जाती है। तिरंगे के लिए तैयार किया जाने वाला कपड़ा जीन्स से भी ज्यादा मजबूत होता है। KKGSS में बनने वाले झंटे केवल कॉटन और खादी के होते हैं।

टेबल से लेकर राष्‍ट्रपति भवन तक अलग-अलग साइज के झंडे
  • सबसे छोटा 6:4 इंच- मीटिंग व कॉन्‍फ्रेंस आदि में टेबल पर रखा जाने वाला झंडा
  • 9:6 इंच- VVIP कारों के लिए
  • 18:12 इंच- राष्‍ट्रपति के VVIP एयरक्राफ्ट और ट्रेन के लिए
  • 3:2 फुट- कमरों में क्रॉस बार पर दिखने वाले झंडे
  • 5.5:3 फुट- बहुत छोटी पब्लिक बिल्डिंग्‍स पर लगने वाले झंडे
  • 6:4 फुट- मृत सैनिकों के शवों और छोटी सरकारी बिल्डिंग्‍स के लिए
  • 9:6 फुट- संसद भवन और मीडियम साइज सरकारी बिल्डिंग्‍स के लिए
  • 12:8 फुट- गन कैरिएज, लाल किले, राष्‍ट्रपति भवन के लिए
  • सबसे बड़ा 21:14 फुट- बहुत बड़ी बिल्डिंग्‍स के लिए
आसान नहीं होता तिरंगा बनाना

KKGSS में बनने वाले राष्ट्रीय ध्वज की क्वालिटी को BIS चेक करता है और इसमें थोड़ा सा भी डिफेक्ट होने पर रिजेक्ट कर देता है। यहां बनने वाले तिरंगों में से लगभग 10 फीसदी रिजेक्‍ट हो जाते हैं। हर सेक्‍शन पर कुल 18 बार तिरंगे की क्‍वालिटी चेक की जाती है। राष्ट्रीय ध्वज को कुछ मानकों पर खरा उतरना होता है, जैसे- KVIC और BIS द्वारा निर्धारित रंग के शेड से तिरंगे का शेड अलग नहीं होना चाहिए। केसरिया, सफेद और हरे कपड़े की लंबाई-चौड़ाई में नहीं जरा सा भी अंतर नहीं होना चाहिए। अगले-पिछले भाग पर अशोक चक्र की छपाई समान होनी चाहिए।

फ्लैग कोड ऑफ इंडिया 2002 के प्रावधानों के मुताबिक, झंडे की मैन्‍युफैक्‍चरिंग में रंग, साइज या धागे को लेकर किसी भी तरह का डिफेक्‍ट एक गंभीर अपराध है और ऐसा होने पर जुर्माना या जेल या दोनों हो सकते हैं।

कितने लोगों की है मेहनत

KKGSS के तहत तिरंगे के लिए धागा बनाने से लेकर झंडे की पैंकिंग तक में लगभग 250 लोग काम करते हैं। इनमें लगभग 80-90 फीसदी महिलाएं हैं। तिरंगे को अलग अलग चरणों में बनाया जाता है, जिनमें धागा बनाना, कपड़े की बुनाई, ब्‍लीचिंग व डाइंग, चक्र की छपाई, तीनों पटिृयों की सिलाई, आयरन करना और टॉगलिंग (गुल्‍ली बांधना) शामिल है।